Sunday, February 21, 2016

शाबर मंत्र क्या हैं



  रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)
शाबर मंत्र क्या हैं
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What are Shabar Mantra 
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    भगवान की शपथ लेकर किसी कार्य को करना देखना हो तो इनका सबसे बड़ा उदाहरण कोर्ट-कचहरी हैं। सामान्य जीवन में भी भगवान की कसम, विद्या रानी की कसम, तुम्हारी कसम, माता रानी की कसम, गंगा की कसम, आदि शब्द प्रायः सुनने को मिल जाएंगे। देखा जाए तो शाबर मंत्र भी इस सौगंध, कसम आदि जैसे शब्दों का ही प्रारूप हैं। शाबर मंत्रों में भी शपथ दिलवाई जाती हैं। परन्तु अन्तर यह होता है कि यहाँ आदेश भी होता है और अधिकार भी। आन और शान तथा श्रद्धा और आदेश अर्थात् धमकी अथवा बलात् अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए याचक बनकर और कहीं अधिकार स्वरूप मंत्रों से याचना करी जाती है। मंत्र ऐसे होते हैं कि साधारण से साधारण ज्ञान वाला व्यक्ति भी इनको सरलता से प्रयोग कर सकता है। मंत्रों में गुरू की प्रधानता होती है। इसीलिए इनके अन्त में शब्द, ''सांचा पिण्ड कांचा, फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा'' और ''मेरी भक्ति, गुरु ही शक्ति। स्फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा'' आदि जैसे शब्द जोड़े जाते हैं।
    यह मंत्र जटिल और क्लिष्ट भाषा से अलग सरल और अपनी ही एक विशेष शैली में होते हैं। यह न दोहे हैं, न चौपाई हैं, न मंत्र हैं, न स्तुति है, न स्रोत हैं न सोरठा है, और न ही गीत-कवित्त आदि।
    इनकी भाषा ठेठ देहाती और प्रांतीय है। इनमें प्रमुखता होती है तो बस गुरु के सानिध्य की और इनमें हुनमंत वीर, भैरव, काली, दुर्गा, गणेश, नाथ, गोरख आदि शब्दों का प्रयोग अवश्य देखने में मिलता है। देवी-देवताओं के साथ-साथ, गोरखनाथ, महेन्द्रनाथ, चौरंगीनाथ, जंलधरनाथ, भरथरीनाथ सुलेमान, पीर-पैगम्बर आदि की शक्ति समाहित हो जाती है, ऐसा वर्णन मिलता है शाबर तंत्र में।
कुछ शाबर मंत्र देखें -
1. ऊँ गौरी। शिव भी आवे। शिव जो ब्यावे। अमुक.... का विवाह शीघ्र सिद्ध करे। देर न करे। जो देर होए, तो शिव का क्रोध होए। तुझे गुरु गोरखनाथ की दुहाई फिरै।
2. मखनो हाथी अम्बारी। उस पर बैठी कमाल खाँ की सवारी। कमाल खाँ, कमाल खाँ मुगल पठान। बैठे चबूतरे पढ़े कुरान। हजार काम दुनियाँ का करे। जा, एक काम मेरा कर। न करे, तो तीन लाख तैतीस हजार पैगम्बरों की दोहाई।
3. ऊँ नमो नगन चीटी महावीर, हूँ पूरो तेरी आश, तूं पूरो मोरी आश।
4. ऊँ नमो आदेश गुरू को। धरती में बैठ्या लोहे का पिण्ड, राख लगाता गुरू गोरखनाथ। आवन्ता- जावन्ता-धावन्ता हॉक देत, धार-धार भार-भार। शब्द साँचा पिण्ड काँचा। फुरो मंत्र, ईश्वरी वाचा।
    देखा जाए तो आज भी अशिक्षित क्षेत्र, गॅाव आदि में रोग उपचार, नज़र उतारना, साधारण सी तांत्रिक क्रियाएं, भूत-प्रेत आदि का आवेश दूर करने के लिए ओझा, तांत्रिक-यांत्रिक, गुनिया तथा झाड़-फूक करने वाले बहुतायत में मिल जाएंगे। तलाशें तो ऐसे लोग भी सभ्य समाज से अलग एक वर्ग विशेष में मिल जाएंगें जो मारण, मोहन, अच्चाटन आदि जैसे विध्वन्सक कर्म स्वार्थ और लालच वश करते हैं। परन्तु शाबर विद्या की मर्म, इसका पूर्ण कल्याणमयी उपयोग आज केवल कुछेक नाथ सम्प्रदाय वालों के पास ही हैं। वह सुप्त और गुप्त हैं, क्योंकि वह मंत्र प्रयोग सामान्यतः नहीं करते।
    इस प्रकार के विचित्र शब्दों वाले शाबर मंत्र क्या अंधविश्वास हैं ? यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह उभर कर सामने  आता है। परन्तु जो सनातनी हैं और मानस में विश्वास रखते हैं। वह एक मत से यह अवश्य स्वीकार करेंगे कि इन विचित्र और अनपढ़ों वाली भाषा में यह मंत्र शाश्वत हैं और किसी जन साधारण कि कल्पना से नहीं रचे गए हैं। रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने भी एक प्रसंग दिया है शाबर मंत्रों के विषय में। हम इस पर अवश्य ही विश्वास करेंगे, यदि हम हिन्दू हैं तो।
''कलि विलोकि जग हित हर गिरिजा,
शाबर मंत्र जाल जिहि सिरजा।
अनमिल आखर अरथ न जापू,
    प्रगट प्रभाव महेश प्रतापू।। इस सोरठा से तथ्य रहस्य स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि कलियुग के संताप भोग रहे और विभिन्न प्रकार का पीड़ाओं से विचलित हो रहे जीवों को देखकर गिरिजा कुमारी का हृदय बहुत द्रवित हुआ और उन्होंने इन पीड़ाओं से मुक्ति दिलवाने के लिए उपाय बताने के लिए शिवजी से प्रार्थना की। उसी समय शिवजी के श्री मुख से शाबर मंत्रों का सृजन हुआ। आज शिव के वरदान स्वरूप यह मंत्र ठीक वैसे ही प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं जैसे कि राम का नाम।
    यदि इनमें द्वेष, कलुषता, विध्वन्सता, ईर्ष्या-द्वेष आदि से अलग निःस्वार्थ भाव और शुद्ध मनः स्थिति से प्रयोग किए जाते हैं तो शाबर मंत्र प्रयोग सफल और फलीभूत होते ही होते हैं और वह भी शीघ्र । सबसे प्रमुख बात तो यह है कि मंत्र स्वयं में सिद्ध हैं। अन्य वैदिक, गायत्री, सनातनी, सात्विक विभिन्न देवी-देवताओं की तरह यह कलिकाल में कीलित नहीं हैं अर्थात् मंत्र उपयोग में लाने के लिए इनका किसी भी प्रकार से उत्कीलन नहीं किया जाता।
    शाबर मंत्रों की सिद्धि के जो विधान हैं वह भी बहुत सरल हैं। एक बार मंत्र सिद्ध करके रख लिए जाते हैं और आवश्यकता के अनुसार तदन्तर में उनका उपयोग किया जाता है। इसे इस प्रकार समझें कि जैसे आपने किसी हथियार आदि का एक बार लाइसैंस ले कर रख लिया।
    यदि शाबर विद्या में सिद्ध हस्त हो जाए कोई तब फिर रोग, शोक, आर्थिक मानसिक, पाविारिक आदि किसी भी प्रकार की समस्या का तत्काल समाधान मिल सकता है, यह अकाट्य सत्य है। परन्तु यह सरल इसलिए नहीं है क्योंकि न तो हमारा मन निर्मल है और न ही हमारी निःस्वार्थ भाव से कार्य करने की भावना। बस इसीलिए मंत्र आज प्रभावी नहीं है और अंधविश्वास, तिरस्कार और  उपहास की श्रेणी में रख दिए गये हैं।


Tuesday, February 9, 2016

हाजरात प्रयोग क्या है




गोपाल राजू के आर्टिकल्स कृपया You Tube पर भी सुन सकते हैं :
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गोपाल राजू
रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)


     सम्भवतः हाजरात शब्द आपके कानों में न पड़ा हो। परन्तु एक समय था जब पलेंचित की तरह हाजरात का खूब चलन था। वह भी आठ-नौ वर्ष की आयु से छोटे बच्चों के माध्यम से। यह एक मुस्लिम प्रयोग है। इसमें सब कुछ निर्भर करता है किसी छोटे से निर्विकार मन वाले बच्चे पर। देखने-सुनने में यह हास्यप्रद लगेगा, पूरी तरह से एक अंधविश्वास। परन्तु व्यवहारिक रूप में जब देखेंगे तो यह पाएंगे कि इसमें कुछ न कुछ प्रतिशत सत्य का अंश है अवश्य। अगर मेरी व्यक्तिगत जानकारी पूछेंगे तब मैं तो यही कहूँगा कि यह मात्र अंधविश्वास ही है। तथापि् इस उद्देश्य से दे रहा हूँ कि गुह्य जगत की कोई भी विधा मेरे लिखने से अछूती न रहे।
    कोई भी इसको सरलता से कर सकता है। इसका सूक्ष्म परिचय जिज्ञासुओं की जिज्ञासा दूर करने के लिए दे रहा हूँ।
21 दिन तक आधीरात के बाद किसी अक़ीक की माला से निम्न मंत्र की एक माला जप करें। जप के समय अपना मुँह पश्चिम दिशा की ओर रखें। माला के मनके उल्टे रूप में फेरें। अर्थात् करतल में मध्यमा उँगली से उल्टे फेरने के स्थान पर अगूँठे से करतल से बाहर की ओर मनका खिसकाएं। इस प्रकार यह मंत्र आपका सिद्ध हो जाएगा।
मंत्र -
''ख़्वाजा खिज्र जिन्द पीर मैदर मादर दस्तगीर मदत मेरा पीरान पीर। करो घोड़े पर भीड़। चढ़ो हज़रत पीर। हाज़र सो हाजर।''
    जिस दिन किसी व्यक्ति के किसी कार्य के प्रश्न के उत्तर अथवा उसके निदान के लिए उपाय तलाशना हो उस दिन सबसे पहले एक छोटे बच्चे को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करिए कि वह शान्त चित्त होकर सीधा बैठ जाए और आपकी बातों में पूरी तरह से अपना मन लगाए।
   अब बच्चे को किसी शान्त से स्थान में बैठा दें। उसके दायें हाथ के अंगूठे में काली चमकदार स्याही या अच्छा हो काजल लगाएं, जिससे की नाखून की सतह चमकीली हो जाए। बच्चे को कहें कि वह अपना सब ध्यान नाखून पर टिका दे। उससे पूछें,
'' तुम्हे कुछ दिखाई दे रहा है ?''
वह अगर कहे 'नहीं'। तो पुनः दोहराएं, ''ध्यान से देखों तुम्हें दिखाई देगा''
''अब देखो बाग दिखाई देगा। बाग में आदमी हैं। वह दिख रहे हैं ?''
एक स्थिति ऐसी आएगी बच्चा बोलेगा,
''हाँ, आदमी दिख रहे हैं''
''उनसे कहो झाडू लगाकर जगह साफ करें। और छिड़काव करके आसन बिछाएं। अब देखो पीरान पीर साहब आकर आसन पर ठाठ से बैठ गए हैं।''
बच्चा निरंतर हामी भरता रहेगा। मानो सब कुछ साक्षात् उसको अपने अगूंठे में दिखाई दे रहा है।
अब बच्चे के माध्यम से प्रश्न कर्त्ता के प्रश्न और उससे सम्बन्धित उपाय के विषय में बच्चे से प्रश्न करें। एक बार में प्रत्युतर न मिले तो पुनः पुनः वह दोहराते रहें।
'' पीर साहब से प्रश्न करो। देखो वह क्या उत्तर देते हैं। अगर बोल न रहे हों तो उनसे कहो कि वह मूक भाषा में सिर हिलाकर  अथवा अन्य सांकेतिक ईशारे से अपना जवाब हाज़िर करें''
    बच्चे के माध्यम से इस प्रकार अनेकों प्रश्नों के उत्तर अथवा समाधान आपको पीर साहब द्वारा मिलते रहेंगे। इसमें बच्चे का संयम से एकाग्र होकर बैठना बहुत आवश्यक है। क्योंकि एक प्रश्न को कई-कई बार दोहराना पड़ेगा तब कहीं जाकर बच्चे को उसका उत्तर मिलेगा। यह स्वभाविक है कि चंचल मन बच्चा लगातार इन बातों से ऊब जाएगा। ऐसे में उसको धैर्य से बस बैठाकर इसी प्रकार से तब तक प्रश्न करते रहना पड़ेगा जब तक पूरी सन्तुष्टी से उत्तर न मिल जाए।
    जब कार्य पूर्ण हो जाए तब बच्चे से कहलवाएं,
''आपका शुक्रिया पीर साहब। अब आप जहाँ से आए थे वहाँ पुनः चले जाएं। आपका शुक्रिया।''

Wednesday, February 3, 2016

अकेला ग्रह और दोष निवारण - लाल किताब से



रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)


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    लाल किताब के अनुसार अकेले ग्रह का महत्त्वपूर्ण स्थान है। लालकिताब की जन्मपत्री में यदि कोई ग्रह किसी भाव में अकेला स्थित है, दूसरे उसको कोई अन्य ग्रह न देखता हो और वह स्वयं भी किसी ग्रह द्वारा न देखा जा रहा हो तो ऐसे ग्रह को अकेला ग्रह कहते हैं। ऐसे ग्रह शुभ भावों में शुभ और अशुभ भावों में स्थित होकर अशुभ फल देते हैं। यदि ग्रह पत्री में कहीं अशुभ भाव में स्थित है तो उसके अशुभ प्रभाव से लाल किताब के सरल से उपायों द्वारा बचा ही नहीं जा सकता बल्कि अशुभता के स्थान पर शुभता का भी फल पाया जा सकता है। कोई भी इन उपायों अथवा टोटकों से स्वयं भी पत्री में अकेला ग्रह तलाशकर तद्नुसार शुभत्व को पा सकता है।
गोपाल राजू के लेखों के लिए कृपया उनके वीडिओ भी 
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सूर्य
    पत्री में सूर्य यदि 6, 7 अथवा 10 वें भाव में स्थित हो। अकेला हो, कोई अन्य ग्रह न तो उसको देखता हो न ही वह किसी अन्य ग्रह से दृष्टि सम्बन्ध बना रहा हो तो ऐसे में कहीं बहते हुए पानी में 8 दिन अथवा 45 दिन तक लगातार गुड़ प्रवाहित कर दें।

चन्द्र
    अगर अकेला ग्रह चन्द्र लाल किताब पत्रों में 6, 8, 10, 11 अथवा 12 वे भाव में स्थित हो तो 8 अथवा 45 दिनों तक नित्य अपने सिरहाने किसी एक पात्र को जल से भरकर रखें। प्रातः उठते ही सर्वप्रथम निःशब्द यह किसी कांटेदार वृक्ष अथवा किसी अन्य वृक्ष की जड़ में छोड़ दिया करें।
मंगल
    मंगल ग्रह यदि अकेला हो और 4 अथवा 8 वें भाव में स्थित हो तो 8 अथवा 45 दिन बहते हुए पानी में गुड़ और तिल की बनी हुई कुछ रेवड़ियाँ प्रवाहित कर दिया करें।
बुध
    अकेला ग्रह बुध यदि 3, 8, 9, 10, 11 अथवा 12 वें भाव में कहीं स्थित हो तो इसको अशुभ प्रभाव से बचने के लिए तांबे के कुछ सिक्के जल प्रवाह कर दें। सिक्के उपलब्ध न हों तो तांबे की चादर से सिक्के के आकार के टुकड़े भी कटवा कर प्रयोग कर सकते हैं।
गुरु
    यदि अकेला ग्रह गुरु 2, 4, 5 अथवा 7 वें भाव में हो तो केसर को जल में घोल कर नाभि में लगाएं तथा केसर का किसी न किसी रूप में 8 तथा 43 दिन सेवन करें।
शुक्र
    शुक्र ग्रह यदि 1, 6 अथवा 9 वें भाव में स्थित हो तो गौशाला में गायों को चारा खिलाया करें।
शनि
    अकेला ग्रह शनि यदि 1, 4, 5 अथवा 6ठें भाव में स्थित हो तब किसी एक पात्र में सरसों का तेल लेकर उसमें अपनी छाया को निहार कर पात्र सहित दान कर दिया करें।
राहु
    अकेला राहु ग्रह यदि 1, 2, 5, 7, 8, 9, 10, 11 अथवा 12वें भाव में स्थित हो तो बहते हुए पानी में कोयला प्रवाहित किया करें तथा मूली का दान करें।
केतु
    केतु यदि 3, 4, 5, 6 अथवा 8वें भाव में स्थित हो तो कुत्ते को रोटी खिलाया करें।