Tuesday, January 26, 2016

नाखून हैं बीमारी का आइना



गोपाल राजू की चर्चित पुस्तक, 'हस्त रेखाओं से रोग परीक्षण' का सार-संक्षेप
रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)
    अधिकांशतः हाथ की उँगलियों के नाखूनों को बस हाथों की सुन्दरता के रूप में ही देखा जाता है। महिलाओं में तो यह विशेष रूप से आकर्षण का कारण होते हैं। इनकी देख-रेख का ध्यान मात्र सुन्दरता और आकर्षण के लिये ही किया जाता है। परन्तु हस्त रेखा शास्त्र में यदि जाएं तब पता चलता है कि नाखून व्यक्ति के स्वस्थ्य शरीर का एक आइना भी हैं। यदि धैर्य और गंभीरता से नाखूनों के रंग, रूप, बनावट, उनमें उभरते हुए विभिन्न चिन्हों की भाषा आदि को समझने का यत्न किया जाए तो अनेकों बीमारियों का लक्षण बताने में यह बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। अनेक चिकित्सकों को बीमार के नाखूनों का परीक्षण करते हुए सबने प्रायः देखा भी होगा।
    अवस्था भेद से नाखून चार प्रकार के होते हैं - लम्बे, छोटे, चौड़े और तंग। जिन व्यक्तियों के नाखून लम्बे होते हैं उनका सीना अथवा फेफड़े कमजोर होते हैं। शारीरिक शक्ति भी उनमें सामान्य से कम होती है। यह शक्ति और भी कम होती है यदि नाखून सिरे के नीचे उँगली की ओर एक पोर से दूसरे पोर तक अधिक मुड़ा हो। पड़ी रेखाओं युक्त अत्यधिक लम्बे नाखून व्यक्ति को किसी न किसी रोग से पीड़ित करते हैं।
    अत्यधिक छोटे नाखून दमा, शीत तथा गले के विभिन्न रोगों से पीड़ित करते हैं। प्रायः नाखून के मूल में नाखून के रंग से हटकर चन्द्रकार आकृति दिखाई देती हैं। यह आकृति ही चन्द्र कहलाती हैं। यह चन्द्र अत्यधिक बड़े नहीं होने चाहिए और न ही उतने छोटे कि नाखून के मूल से निकले मात्र दिखलाई दें। सामान्य आकृति के यह चिन्ह एक स्वस्थ शरीर के प्रतीक हैं। अत्यधिक छोटे नाखून पर चन्द्र की अनुपस्थिति वाले लम्बे, सिरे पर चौड़े तथा नीचे मूल पर नीलिमा युक्त नाखून शरीर में असामान्य रक्त प्रवाह तथा हृदय रोग होने का संकेत देते हैं।
    अत्यधिक बड़़े आकार के नाखून पर उपस्थित चन्द्र रक्त प्रवाह की शीघ्रता दर्शाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक कार्य करने की शक्ति रखते हैं। परन्तु इसके परिणाम स्वरूप सम्भावना यह रहती है कि रुधिर का प्रवाह मस्तिष्क की और बढ़ने के कारण मूर्छा, मिर्गी, पक्षाघात, अर्धांग अथवा वायु रोग हो सकते हैं। ऐसी आकृति वाले नाखून के व्यक्ति कोई भी नशा जैसे शराब, भांग, चरस आदि का सेवन करते हैं तो उनकी धर्मानियों पर रक्त के अत्यधिक प्रवाह से उत्पन्न दबाव के कारण धमनी फट भी सकती हैं।
    चन्द्र की अनुपस्थिति, पतले, तथा नीचे से चपटे आकार वाले नाखून, जो मांस में धँसने से प्रतीत होते हैं, व्यक्ति को लकवे का रोगी बनाते हैं। अधिक लम्बे, ऊँचे तथा अधिक मुड़े हुए नाखून रीढ़ की हड्डी सम्बन्धी रोग देते हैं।
    प्रायः देखा जाता है कि अत्यधिक परिश्रम अथवा किसी लम्बी बीमारी से पूर्व अथवा बाद में नाखून पर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इसका अर्थ होता है मस्तिष्क तथा स्नायविक जाल पर आवश्यकता से अधिक तनाव बढ़ जाना। यदि यह सफेद धब्बे नाखून पर वैसे ही दिखाई दें तो समझना चाहिए कि व्यक्ति स्नायविक रोग का शिकार हो रहा है अथवा उसकी स्नायविक शक्ति का ह्रास हो रहा है।
    नाखूनों पर हल्का सा नील वर्ण संकेत देता है कि शरीर में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। इससे फेफड़ों से सम्बन्धित अनेक रोग हो सकते हैं। नेल क्लबिंग अर्थात् लम्बे नाखून उँगलियों की तरफ मुड़ने लगें तब यह समस्या विकट रूप लेने लगती है। यदि नाखून खुश्क अर्थात् रुखे से हैं और बहुत ही कमजोर हो गए हों - बिल्कुल निर्जीव से तो भी यह फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी की ओर संकेत करते हैं। यदि नाखून पर एक से अधिक सफेद धारियाँ आ गयी हैं तो यह शरीर के अन्दर पोषक तत्वों की कमी को दर्शाते हैं। ऐसे में अनेक रोग गुर्दे से सम्बधित हो सकते हैं।
    अन्दर से खोखले और बहुत ही नर्म नाखून शरीर में लोह खनिजों की कमी तथा लीवर से सम्बन्धित रोग दर्शाते हैं। यदि नाखून भंगुर हैं अर्थात स्वयं टूटने लगें तब यह भी शरीर में लोह तत्त्वों की कमी की ओर संकेत करते हैं। आयरन की कमी से शरीर में अनेक रोग जन्म लेने लगते हैं। इससे हीमोग्लोबिन, लिपिड प्रोफाइल आदि सब प्रभावित होने लगते हैं। शरीर में एनीमिया अर्थात् खूनकी कमी का यह बहुत ही स्पष्ट लक्षण होता है।
    नाखूनों की प्राकृतिक चमक धूमिल होने लगे तब इससे से सचेत हो जाएं क्योंकि यह ऍनेमिक होने का लक्षण है। ऐसे में मधुमेह और लीवर से जुड़ी अनेक बीमारियों की सम्भावनाएं हो सकती हैं। यदि नाखूनों पर काले धब्बे अथवा काली रेखाएं उभरने लगें तब यह निश्चित रूप से गम्भीर बीमारी का संकेत है।
    स्वस्थ शरीर के लिए नाखूनों से परख का सबसे अच्छा उपाय है - अपने नाखूनों को अंगूठे से दबाएं, इससे नाखून सफेद रंग में बदल जाएंगे। जब दबाव हटाएंगे तब उनमें गुलाबी रंग की आभा उभर आएगी। यदि ऐसा नहीं है अर्थात् दबाव हटने के बाद नाखूनों में सफेदी दिखाई दे तो समझ लें यह स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा लक्षण नहीं है। दूसरा सबसे अच्छा प्रयोग है नाखूनों के मूल में स्थित चन्द्र की आकृति को ध्यान से देखें। या तो यह हों ही नहीं और यदि हों तो न तो बहुत सुक्ष्म हों और न ही बहुत बड़े । दोनों ही चिन्ह शरीर में सामुद्रिक शास्त्र में वर्णित अन्य लक्षणों के अनुरूप विभिन्न रोग दर्शाते हैं।


Tuesday, January 12, 2016

Shambhvi Mudra - शाम्भवी मुद्रा




गोपाल राजू का 
लेख पढ़ने के लिए कृपया लिंक भी क्लिक कर सकते हैं :
http://bestastrologer4u.com/ArticlePDF/ShambhviPDF.pdf





Sunday, January 10, 2016

एम्पेथी - दूसरों को समझने की एक कला



    
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    सहानुभूति दिखलाना एक ऐसा मनोभाव है जो दुःख-दर्द देखकर स्वतः उपजने लगता है। किसी की दुर्घटना देखी, किसी का विद्रोह देखा, किसी को दर्द अथवा भूख आदि से तड़पते देखा तब एक बार को, यदि वैष्णव मत का है, तो मन द्रवित हुए बिना नहीं रहता।
    अंग्रेजी में इसको (Sympathy) कहते हैं। इसके विपरीत ऐसे कठोर दिल वाले भी हैं जो किसी के दुःख-दर्द से विक्षप्त ही नहीं होते। किसी का गला काटना, किसी की हत्या करना, किसी असहाय को सताना उसे कष्ट पहुँचाना बहुत ही सामान्य सी बातें होती हैं उनके लिए। ऐसी मनःस्थिति वालों की बात तो जाने देते हैं। परन्तु यदि कठोर से कठोर हृदय और मानसिकता वाला व्यक्ति किसी कष्टकारी स्थिति, उसके दुःख दर्द अथवा वेदना आदि को स्वयं के ऊपर घटित होने की कल्पना करे और उस वेदनामयी मनःस्थिति में कल्पना भी कर लें कि दूसरे का कष्ट, पीड़ा वेदना कैसे दूर हो तो इसको अंग्रेजी में (Empathy)  कहते हैं।
    ऐम्पेथी में व्यक्ति के अन्दर स्वतः एक प्राकृतिक अभिव्यक्ति का प्रार्दुभाव होने लगता है। उसके मन में दूसरे के प्रति सहायता, सहयोग, चिंता का भाव उत्पन्न होने लगता है। जो लोग दूसरे के लिए किसी भी प्रकार के कार्य करने अथवा करवाने से जुड़े हुए हैं उनमें यदि दूसरे के प्रति वास्तव में सहयोग, सहायता का भाव इस अभिप्राय से छिपा हुआ है कि सहायता वह दूसरे के दुःख और दर्द को दूर करने के लिए नहीं वरन् अपने स्वयं के अथवा अपने परिजनों के कष्टों को दूर करने के उद्देश्य से कर रहा है। तो इस कर्म में उसको जो सुखानुभूति होगी वह अनन्तान्त और चिरस्थाई होगी। ऐम्पेथी के मनोभाव से किया गया कार्य यदि प्रत्येक व्यक्ति अंगीकार कर ले तब तो धरती ही स्वर्ग बन जाएगी।
    वैद्य, डॉक्टर, हक़ीम, समाजिक कार्यों में लिप्त लोग, व्यवसायी वर्ग, ज्योतिष, तंत्र, मंत्र कर्म काण्ड आदि के व्यवसाय में लिप्त लोगों के लिए तो मन में यह भाव अवश्य ही रहना चाहिए कि वह दूसरे का दुःख-दर्द स्वयं के ऊपर अनुभूत होकर अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। इसके परिणाम तो सुन्दरतम होंगे ही साथ ही साथ स्वयं को भी एक दिव्य आनन्द की अनुभूति होगी।

Best Astrologer in India: जीवात्मा का मूल लक्ष्य है परमात्मा की प्राप्ति

Best Astrologer in India: जीवात्मा का मूल लक्ष्य है परमात्मा की प्राप्ति:    जीवात्मा का मूल लक्ष्य है परमात्मा की प्राप्ति     एक अंश है और दूसरा अंशी। इनका परस्पर मिलना ही पूर्णता है और इसको अध्यात्म...

जीवात्मा का मूल लक्ष्य है परमात्मा की प्राप्ति




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    एक अंश है और दूसरा अंशी। इनका परस्पर मिलना ही पूर्णता है और इसको अध्यात्म की भाषा में कहें तो मोक्ष है। परमात्माकी प्राप्ति के अनेकों मार्ग ऋषि, मुनी और अध्यात्म ममज्ञों ने बताए हैं। अपने-अपने बुद्धि और विवेक से अध्यात्म पथ पर अग्रसर जीव उनको अपना रहे हैं। परन्तु सब साधनों में कर्म, ज्ञान और भक्ति यह तीन शास्त्रकारों ने सर्वोत्तम कहे हैं।
    कर्म से तात्पर्य है विद्या अर्जित करना, नौकरी करना, व्यापार करना, अपने और अपने परिजनों के लिए संसाधन जुटाना, माता-पिता की सेवा करना, दान, पुण्य आदि। ''जैसा कर्मकरेगा, वैसा फल देगा इंसान'' यह है गीता का ज्ञान। भेदाभेद की दृष्टि से यह समस्त कर्म श्रौत, स्मार्त आदि हैं। धर्म, कर्म काण्ड, यज्ञ, योग आदि कर्मों को श्रौत कर्म कहा गया है, बाकि अन्य जीवन के  लिए आवश्यक कर्म स्मार्त कर्म की श्रेणी में रखें गए हैं। यदि कर्म स्वार्थवश किए गए हैं तब तद्नुसार सुख अथवा दुःख की प्राप्ति होती है और यदि निस्वार्थ भाव से किए गए हैं तब परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं, यह परम सत्य है।
    ज्ञान शब्द 'क्षा' धातु से बना है इसका अर्थ है जमना। परमपिता तत्व को जान लेना ही वस्तुतः ज्ञान है। देखा जाए तो ज्ञान की प्राप्ति सरल नहीं है क्योंकि इसके लिए संस्कार और सत्संग परम आवश्यक हैं। यह उपलब्धि एक, दो नहीं वरन अनन्तानन्त जन्म-जन्मात्तरों में भटकने के बाद सम्भव हो पाती हैं। इसीलिए परमात्मा की प्राप्ति का यह मार्ग अत्यन्त ही दुर्गम और क्लिष्ट है।
    मनीषियों ने परमात्मा प्राप्ति का तीसरा मार्ग भक्ति सर्वाधिक सरल और सुगम बताया है। भक्ति में तीन शब्दों का भेद छिपा है - सेवा सम्बन्धी, आत्मसम्बन्धी और ब्रह्म सम्बधी। भक्ति के प्रधानतः नौ भेद बताए गए हैं। नवद्या भक्ति से जीव का जीवन सफल हो जाता है। काम, क्रोध, तथा लोभादि से अलग जो जीव परमात्मा में इस नवधाभक्ति में आस्था और श्रद्धा से लीन हो जाता हैं उसको अन्ततः परम पद अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति होती ही होती है। भक्ति के नौ भेद हैं -
1. श्रवण अर्थात् परमात्मा की लीला, कथा, शक्ति रूप, वर्णन आदि श्रद्धा भाव से सुनना।
2. कीर्तन अर्थात् परमात्मा के नाम, गुण, चरित्र, पराक्रम आदि का कीर्तन करना।
3. स्मरण अर्थात् परमात्मा का प्रत्येक स्थिति, समय, स्थान आदि में ध्यान करना। उनके ध्यान में ही रमें रहना।
4. पाद सेवा अर्थात् परमात्मा के श्री चरणों का आश्रय और उनकी सेवा में भाव-विभोर होकर सदैव लीन रहना।
5. अर्चना अर्थात् मन, कर्म और वचन से ईश्वर का पूजन करना।
6. वन्दन अर्थात् परमात्मा की साकार अथवा निराकार रूप में सेवा और वन्दना करना।
7. दास्य अर्थात् परमात्मा के प्रति सदैव ऐसे भाव बनाकर उनके अस्तित्व को स्वीकारना जैसे कि वह स्वामी  और हम उनके तुच्छ और निरीह दास हैं।
8. सख्य अर्थात् सच्चे मन से परमात्मा को अपना सखा मानकर अपने समस्त पाप और पुण्य का उनसे सांझा करना।
9. आत्म निवेदन अर्थात् प्रभु की सत् सत्ता में अपने को तन, मन और धन से समर्पित कर देना। सदा यह भाव रखना कि सब कुछ प्रभु के ही हाथ है। बस अपना कर्म किया और प्रभु ऊपर अपने है।