Wednesday, October 28, 2015

कैसे साधन करें खेचरी मुद्रा




 कैसे साधन करें खेचरी मुद्रा  
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    घेरण्ड संहिता में 25 मुद्राओं का बहुत ही सुन्दर वर्णन सविस्तार से मिलता है। इन मुद्राओं में महामुद्रा, विपरीत मुद्रा, योनि मुद्रा, शाम्मिवी मुद्रा, अगोचरी मुद्रा, भूचरी मुद्रा, और खेचरी नामक इन सात मुद्राओं का विशेष स्थान माना गया है।
    इन मुद्राओं से अंहकार, अनिद्रा, भय, द्वेष, मोह आदि के पंचक्लेषदायक विकारों का शमन होता है। अनेक शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। ऋण-प्राण और धन-प्राण का मुद्राओं द्वारा एकीकरण होता है। जिससे मस्तिष्क को बल मिलता है और बुद्धि का विकास होता है। मुद्राओं से कार्य करने की क्षमता बढ़ती है और विशेष रूप से प्राणभय कोष के अनावरण में सहायता मिलती है।

    मुद्राओं में खेचरी मुद्रा का विशेष स्थान माना गया है। इसके द्वारा ब्रह्माण्ड में शेषशायी सहस्रदल स्थित परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। इसलिए यह मुद्रा अन्य मुद्राओं से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
कैसे साधन करें खेचरी मुद्रा
    प्रारम्भिक अभ्यास में जिव्हा के अग्रभाग को मोड़कर तालू से लगाने का प्रयास करें। धीरे-धीरे जिव्हा को तालू के गड्डे में लटक रहे मांस के घण्टे को छूने का यत्न करें। जिव्हा के अग्र भाग को प्रारम्भिक अवस्था में इस प्रकार पीछे की ओर मोड़ना अत्यन्त कठिन लगेगा। सरलता के लिए जीभ के अग्रभाग पर काली मिर्च पाउडर का हल्का सा लेप भी कर सकते हैं। इससे उत्तेजना उत्पन्न होगी और जिव्हा के अग्र भाग को तालू के पीछे तक खिसने से उत्तेजित तन्तु शान्त होंगे।

    जब जिव्हा को इस प्रकार पीछे मोड़कर तालू के अन्त तक पहुँचाने का अभ्यास सरल और सुगम लगने लगे तब सात्विक भाव से मन को निर्मल कर किसी भी सुखद आसन में कहीं शान्त जगह बैठ जाएं। जिव्हा के अग्रभाग को कंठ में स्थित कौवे अर्थात् मांस के लटक रहे घंटे के मूल में खिसने का यत्न करें। सारा ध्यान इस भाग पर ही केन्द्रित कर लें। एक ऐसी अवस्था बहुत ही अल्प समय में आने लगेगी कि जिव्हा तालू से स्पर्श हो रहे तन्तु एक विचित्र सा मीठा पदार्थ अनुभव करने लगेंगे। विचित्र बात यह होगी कि यह दिव्य मिठास वाला पदार्थ तालू के इस भाग पर ही आभास होगा। जितना अधिक जिव्हा को वहाँ खिसा जाएगा उतनी ही अधिक मिठास और उसका दिव्य स्वाद अनुभव होता जाएगा। यह दिव्य पदार्थ वस्तुतः अमृत तुल्य ही है। इसका पान करके ही सिद्ध योगी, देवता, ऋषि-मुनी दिव्यता और अमृत्व को प्राप्त हुए हैं। यदि इस पदार्थ को तालू से जिव्हा द्वारा मुँह के बाहर निकाल कर एकत्र करने का प्रयास किया जाए तो यह कभी भी सम्भव नहीं होगा। एकदम विचित्र बात है कि यह अमृत तुल्य पदार्थ जब जिव्हा के तंतु स्पर्श करके अनुभव कर रहे हैं, उसके स्वाद का रसपान कर रहे हैं तब यह उस स्थान विशेष से लाख प्रयास करने के बाद भी बाहर क्यों नहीं आ पाता।

Saturday, October 24, 2015

Astrology in Hindi

|| Most Alarming for Beginner Astro-tantrik ||
कोई उपाय कर रहे हैं क्या ?
कृपया सावधान रहें |
उन लोगों के लिए विशेष रूप से
जो ज्योतिष शास्त्र के साथ-साथ
उपाय कर्म में जुड़े हुए हैं |
सुने गोपाल राजू का एक साक्षात् तंत्र का अनुभव |
किसी भी तंत्र क्रिया से पूर्व अपने बुद्धि का प्रयोग अवश्य करें |

Monday, October 19, 2015

दूर्वा से प्राप्त करें सौभाग्य



रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)
www. Bestastrologer4u.blogspot.in
 



    धरती पर प्राप्त समस्त वनस्पतियों में दूर्वा एक ऐसी है जिसको अमृत्त्व का वरदान प्राप्त है। पुराणों में वर्णन आता है कि श्रीर-सागर मथे जाने पर प्राप्त अमृत से कुछ बूंदे छलक कर जब दूर्वा पर रखे अमृत कलश से गिरी तब उसके स्पर्श से दूर्वा अजर-अमर हो गयी। तब से वह देवताओं के लिए पवित्र और पूजनीय बन गयीं। देवताओं ने भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन गंध, पुष्प , धूप, दीप नैवेद्य, नारियल, आम्र, दधि, अक्षत् आदि से उसका पूजन किया। देवताओं के साथ-साथ उनकी पत्नियों तथा अप्सराओं ने भी उसका पूजन किया। तदन्तर में भूलोक पर वेदवती, सीता, दमयन्ती आदि अनेक नारियों ने सौभाग्य दायिनी दूर्वा का पूजन करके अपने अभीष्ट की प्राप्ति की।
    जो नारी सात्विक और श्रद्धा भाव से दूर्वा का पूजन करके तिल, गोदुग्ध, सप्त अनाज आदि का दान करती हैं, उनको सौभाग्य की प्राप्ति होती है। संतान की प्राप्ति के लिए अथवा संतान सुख के लिए दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाला व्रत अवश्य ही इष्ट सिद्धि प्रदायक होता है।
 व्रत में जपने के लिए धर्मशास्त्रों में जिस मंत्र का वर्णन है वह है-
    त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुरा सुरैः।
   सौभाग्यं संततिं कृत्वा सर्वकार्यकरी  भव।।
   यथा  शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृतासि  महीतले।
   तथा  ममापि  संतान  देहि त्वमजरामरे।।

पुरूषों के लिए दूर्वा का सरलतम उपाय
    अपनी चर्चित एक पुस्तक ''सौभाग्य जगानेके उपाय'' में इसका मैंने विस्तृत वर्णन भी किया है। सर्वप्रथम अपने घर, प्रतिष्ठान , भवन, कर्मस्थल आदि के मुख्य द्वार के ऊपर गणेश जी की एक ऐसी प्रतिमा, मूर्ति, यंत्र, विग्रह आदि स्थापित कर लें जिसमें गणेश जी की सूँड उनके दायीं और मुड़ी हो। देव का मुख भवन के अन्दर की ओर होना चाहिए। प्रातः जब भी नित्य कर्म में अपनी दैनिक पूजा करते हैं तो उससे पहले एक दूर्वा तोड़कर उसको स्वच्छ करके देव को अर्पित कर दिया करें। बस, मात्र इतना ही। यदि समय हो और श्रद्धा, आस्था भाव बढ़ने लगे तो दूर्वा चढ़ाते समय देव का कोई मंत्र, बीज, स्तोत्र, स्तुति, आरती आदि जो कुछ भी मन को भाये वह कर लिया करें।
    यदि यह कर्म नित्य सम्भव न हो तो प्रत्येक सोमवार के दिन यह अवश्य कर लिया करें। नयी दूर्वा अर्पित करने के बाद पुरानी दूर्वा कहीं जल में विसर्जित कर दिया करें अथवा किसी पवित्र स्थान में छोड़ दिया करें।


Friday, October 16, 2015

सूफी नृत्य से चलें एक रूहानी दुनिया में



मूल लेख
सिविल लाइंस
रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)
+९१ १३३२ २७४३७०
ईमेल: gopalraju08@gmail.com




    सूफीमत से हर कोई परिचित है। परन्तु अधिकांश लोगों को इसके मर्म, उद्देश्य और सबसे महत्त्वपूर्ण और चैतन्य बोध प्राप्ति आदि का सम्भ्वतः पूर्ण ज्ञान न हो। सूफीमत में देखा जाए तो इस्लाम से इतर उसमें बौद्ध, इसाईमत, हिन्दुत्व, ईरानी, जर्थुस्त्रवाद के अंशों का सम्मिलन है। इस्लाम ने संगीत को और गाजे-बाजे आद को कभी महत्त्व नहीं दिया परन्तु सूफी संतो  ने उसको ही चैतन्य बोध का आधार बनाया। इसीलिए कट्टरवादियों की नजरों में सूफी काफिर भी बन गये।
गहरे डूबना ही उद्देश्य 

    सूफी मत में कर्मकाण्ड के स्थान पर दिल के हाल पर विशेष बल दिया गया है। उनका बस एक ही आग्रह है, जो भी करना है वह पूरे दिल से करना है। नमाज़ पढ़नी है तो वह पूरे दिल से पढ़ो। वजू करना है तो वह पूरे दिल से करो और उसमें इतना गहरा पैठ जाओ कि शरीर ही नहीं बल्कि समस्त ब्रह्माण्ड अच्छे से साफ और पाक हो जाए। संगीत में जाना है तो उसमें पूरी तरह से सबकुछ भूलकर बस भक्ति भाव में डूब जाओ।
भारतवर्ष में व्यापक प्रचार-प्रसार
    सूफीमत का भारतवर्ष में देखा जाए तो व्यापक प्रचार हुआ। यहाँ कुल चार सूफी सम्प्रदाय प्रसिद्ध हुए। बंगाल का सुहरावर्दी सम्प्रदाय, जिसके प्रवर्तक हज़रत जियाउद्दीन थे। अजमेर का चिश्तिया सम्प्रदाय, जिसके प्रर्वतक हज़रत अदब अब्दुल्ला चिश्ती थे। इसमें निजामुद्दीन औलिया, मलिक मौहम्मद, अमीर खुसरू आदि विश्व प्रसिद्ध संत हुए। तीसरा शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी का कादिरिया और चौथा था नक्शवंदील जिसके प्रर्वतक ख्वाज़ा बहाउद्दीन नक्शबंदी थे। बिहार के सुप्रसिद्ध महदूम शाह इसी सम्प्रदाय के थे।
सूफी बन्धनों से सर्वथा अलग-थलग

    सूफी मतावलंबी दिखावे, तड़क-भड़क और ऐश्वर्य भय जीवन से दूर सादा जीवन और उच्च विचार पर बल देते थे और सबसे महत्त्वपूर्ण जो उनमें चलन में रहा वह था धार्मिक तथा नैतिक बंधनों से सर्वथा मुक्त रहना। नमाज़, रोजा, हज, ज़कात, ज़िहाद आदि से तो उन सब सूफी संतो का कभी कोई लेना देना नहीं रहा
हर दम में रूहानीमस्ती
    सूफी मत में संगीत की धुन पर मस्ती से नाचना बहुत अधिक प्रचलित है। सूफी गायकी में अनेक प्रसिद्ध गायकों ने सूफी गीतों को जीवन्त कर दिया। उनके बोल, उनकी धुन, संगीत और मदमस्ती भरी गायकी सब ऐसा है कि सूफीमत से सर्वथा अंजान व्यक्ति भी एक बार को सुनकर मस्ती में झूमने लगे।
    सूफीआना गीतों में क़व्वालीनुमा भजन 'दमादम मस्त कलन्दर' शायद ही कोई ऐसा संगीत प्रेमी होगा जिसने न सुना हो। इस अमर गीत के महानायक सुहारवर्दी सम्प्रदाय के हज़रत सखी लाल शाहबाज कलन्दर थे। सखी संत का वास्तविक नाम हज़रत सैयद उस्मान था। वह सुर्खलाल रंग का चोला पहनते थे इसीलिए वह लाल कलन्दर कहलाने लगे। यह गीत वस्तुतः सिंघ प्रान्त के हिन्दु संत श्री झूले लाल का एक भजन था जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीपों में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। संत झूले लाल को सम्बोधित करके उनके सामने माँ की फरियाद की गयी है इस कव्वालीनुमा भजन में। यह प्रसिद्ध गीत पंजाबी और सिंधि मिश्रित भाषा में है। अनेकों सूफी गायकों ने इस भजन को अपनी आवाज़ देकर मस्ती में लाखों लोगों को झुमाया है। इस अमर-गीत 'दमादम मस्त कलन्दर' का अर्थ है - हर सांस (दम) में मस्ती रखने वाला फ़क़ीर (कलन्दर)

चैतन्य बोध के लिए रूहानी सूफी नृत्य
    सूफी संत-फकीर अथवा कलन्दर चैतन्य बोध के लिए एक विशेष प्रकार का नृत्य करते हैं। इनका एक नाम सूफी दरवेश नृत्य भी है। शान्त, मध्यम और संगीतपूर्ण लयबद्धता में सूफी एक स्थान पर एन्टिक्लाक वाइज़ मस्ती में घूमते हैं। घूमने की गति मस्ती के साथ बढ़ती जाती है और अपनी-अपनी सामर्थ्य और शक्ति की अनुसार एक लट्टू की तरह घूमने लगती है। अध्यात्म-रूहानियत में रमने के बाद एक ऐसी अवस्था भी आ जाती है जब अर्ध्य विक्षप्त सा भक्त, संत ज्ञानी, सूफी, दरवेश, फकीर आदि मस्ती में झूमने लगता है, नाचने लगता है अपने तन-मन की सुध खोकर। ईश प्रेम में लगभग पागल सा हो जाता है। इस अवस्था में उसका मन एक दम से निर्मल हो जाता है। मीरा, चैतन्य,www.bestastrologer4u.blogspot.in कृष्ण की रास लीला आदि इसके प्रमाण हैं। एक अन्य मार्ग भी है रूहानियत की इस भ्रामक और प्रचलित अवस्था को पाने का जिसमें लोग रमें हुए हैं। चरस, गांजा, भांग, शराब आदि मादक द्रव्यों में लिप्त होकर अपने को 'खोना' अब यह वाला खोना कौन वाला 'खोना' है, इसमें कोई तर्क -कुतर्क नहीं। अपने-अपने बुद्धि और विवेक से स्वयं अच्छे-बुरे का मनन कर लें।  हाँ, वास्तव में यदि रमना है
 तब आप भी रमें इस रूहानी दुनिया के सूफी नृत्य में। परन्तु सर्वप्रथम यह अवश्य संकल्प ले लें कि विकृत मानसिकता और तामसिक खान-पान के माध्यम से कृपया इस मार्ग में जाने की न सोचें।
आइए चलें  रूहानी दुनियां में
    एक शान्त सा स्थान चुन लें। कोई भी ढीले-ढाले आरामदायक वस्त्र अवश्य धारण कर लें। मन पसंद सूफी संगीत की धुन-गीत बहुत ही मध्यम ध्वनि में बजा लें। एक स्थान पर स्थिर खड़े होकर अर्धखुली आँखों के साथ दाएं हाथ को कंधे के बराबर ऊंचा उठा लें और आकाश के समानान्तर हथेली खोल लें। बाएं हाथ को सामान्य स्थिति में लटका रहने दें। उसकी हथेली खोल कर धरती के समानान्तर फैला लें। इस मुद्रा में ही अपने स्थान पर खड़े हुए एन्टी क्लॉकवाइज़ घूमना शुरू करें। संगीत की धुन के साथ अपने घूमने की गति भी धीरे-धीरे बढ़ाते जाएं।

Thursday, October 15, 2015

ध्यान कैसे लगे


मानसश्री गोपाल राजू

                               ध्यान कैसे लगे

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    बहुत ही सरल और सुगम है ध्यान लगाना। सहज और हठ दोनों ही क्रियाओं से यह साधा जा सकता है। अगर क्लिष्ट साधनाओं में जाएं तब अनेकों स्कूल घर से बाहर मिल जाएंगे। बहुत से गुरु, ज्ञानी, स्वामी, सन्यासी हैं जो एक शिक्षा विषय के पाठ्यक्रम की तरह इसका ज्ञान बाटते हैं।  बहुत अच्छा है सब। परन्तु तब कष्टप्रद हो जाता है जब किसी को कहते सुना जाता है, ''अरे यार सब पैसा और समय नष्ट हो गया और कुछ भी नहीं मिला, सब ठग विद्या है।''
    देखा जाए तो ध्यान के लिए वाह्य क्रम-उपक्रमों से इधर-उधर भागकर अथवा भटककर तो कुछ मिलना कठिन ही है। इसके लिए, देखा जाए तो कुछ करना ही नहीं है। कहीं भटकना नहीं है। कहीं भागना भी नहीं है। अर्थ, धर्म, कर्म आदि में तो बिल्कुल ही जाना नहीं है। ध्यान लग गया तब धर्म-कर्म तो स्वतः ही परिभाषित होकर सरल-सुगम हो जाएंगे। धर्म-कर्म , पूजा-पाठ, साधना-अनुष्ठान, शिक्षा-दीक्षा आदि सब के लिए तो सब जानते ही हैं कि कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। कितना भटकना पड़ता हैं। विशेषकर आज के परिपेक्ष्य में तो क्या अपनाएं और क्या छोड़ें। नाम, धर्म, देवी-देवता एक फैशन की तरह देखे जाते हैं। टी.वी., गाने-बजाने, प्रचार-प्रसार आदि जिस किसी भी माध्यम से जिसका बोल बाला हो जाए, जिसका कद, बैनर अथवा आकर्षण बढ़-चढ़कर दिखाई देने लगे, उसके पीछे ही अंध दौड़ लग जाती है। परन्तु इससे वास्तव में क्या ध्यान लग रहा है? अपने अन्तःमन में स्वयं एक बार सच्चाई के साथ झांकर देखें और उससे ही उत्तर लेने का यत्न करें।
    ध्यान के लिए तो कुछ करना ही नहीं है। बस अपनी श्वास और प्रश्वास को शान्ति से देखने का यत्न करें। सांस के आने और जाने की गति पर बस सहजता से ध्यान केन्द्रित करें। सांस आता है और सांस जाता है अथवा सांस आ रहा है और सांस जा रहा है। इस क्रम में बलात् कोई भी चेष्ठा नहीं करनी है। जब कभी 
समय-असमय, दिन-रात, उठते-बैठते याद आ जाए, बस सांस को आते और जाते देखने, अनुभव करने का प्रयास करें। धीरे-धीरे श्वास-प्रश्वास का मर्म स्वतः ही सहज होने लगेगा। एक आराम दायक सुखद स्थिति में इस मर्म का बोध होने लगेगा। एक बार इस प्रभावपूर्ण स्थिति में अगर प्रवेश हो गया तब अकस्मात् अनुभूत होने लगेगा कि इतनी सुखद स्थिति में कभी हम गये ही नहीं थे। इसको ही बस ध्यान लगने की सीढ़ी मिली समझिए। पैर रखना है और  चढ़ते जाना है ऊपर से ऊपर।
    इस सहज क्रिया को सैकड़ों ध्यान साधना ममज्ञों ने अपने-अपने अनुभवों के आधार पर अलग-अलग रूप में अभिव्यक्त किया है। विपश्यना क्रिया उनमें से एक है। समझें तो ध्यान लगाने की अत्यन्त सरल नर्सरी के पाठ्यक्रम जैसी और मर्म समझ न आए तब तो क्लिष्ट और कभी न समझ आने वाली एक पहेली।
आद्यशक्ति गायत्री के गुणगान एवं तत्वदर्शन से भारतीय आर्ष ग्रंथ भरे हुए हैं। भावनात्मक, भक्तिपरक, दार्शनिक एवं व्यवहारिक-क्रियापरक सभी तरह के शास्त्रों में इस मूलधारा का उल्लेख, विवेचन, स्तवन अपने-अपने तरीके से लिखा गया है। गायत्री का अर्थ है - मनन, विद्या, विज्ञान एवं विचार। यह प्राणों का परित्राण करने की विद्या है।
अनुष्ठान के उदाहरण हैं -
    अगर गायत्री मंत्र के अनुष्ठान में जा रहे हैं तब उसके अनेक प्रकार मिलते हैं । लघु अर्थात् अनवरत 9 दिन में पूरा होने वाला 24,000 गायत्री मंत्र जप। मध्यम अर्थात् 40 दिन में सवा लाख मंत्र पूरा करने का अनुष्ठान तथा दीर्घ अर्थात् एक वर्ष में 24 लाख मंत्र जप।
    सीधा सा गणित देखें तो लघु के लिए नित्य 27, मध्यम के लिए नित्य 33, तथा दीर्घ के लिए नित्य 46 मालाएं जपकर अनुष्ठान पूरा होता है। यदि एक बैठक में सम्भव न हो तो दो अथवा तीन भागों में भी पूर्ण किया जा सकता है। परन्तु जिस संख्या में माला छोड़े, वह विषम होनी चाहिए, अन्तिम माला संख्या में भले ही सम हो।
    गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। भूः स्वः की तीन व्याहृतिया ब्रह्मा, विष्णु और महेश बनीं। इन्हीं से सरस्वती, लक्ष्मी तथा काली का प्रादुर्भाव हुआ । 'देवी भागवत् पुराण' में गायत्री के 24 अक्षर, 24अवतार, 24 देवता, 24 ऋषि माने गए हैं। दत्तात्रेय के 24 गुरु भी यही हैं। इसी प्रकार गायत्री मंत्र के 24 अक्षर हैं, 24 छंद, 24 तत्व, 24 देव शक्तियाँ, 24 देवियाँ, 24 बीज मंत्र, 24 विभूतियाँ, 24 प्रतिफल तथा 24 रंगों का वर्णन मिलता है। 'शंखसंहिता' में लिखा है कि 24 अक्षर वाले इस महामंत्र में सर्वाधिक पापों का नष्ट करने की क्षमता है। इहलोक और द्युलोक में गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहीं है।
    गायत्री को तारक मंत्र भी कहते हैं। गायत्री मंत्र है -
       ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
       भर्गोदेवस्य धीमहि
       धियो योनः प्रचोदयात्।
ऊँ   -  सर्व रक्षक
भूः  -   सर्वप्राण और जीवनदाता
भुवः -   सर्व दुःखनाशक
स्वः  -  आनन्द धाम परमात्मा
तत्  -  उस
सवितुः  -  प्रेरक उत्पादक पिता एवं अतुल दानी एवं प्रकाश के देव
वरेण्यम्  -  वरण करने योग्य
भर्गः   -  पापनाशक दिव्य तेज को
देवस्य  -  देवता स्वरूप को
धीमहिः  -  हम धारण करते हैं
धियो   -  हमारी बुद्धि
योनः   -  जो
प्रचोदयात्  -  सदैव उत्तम कर्मों की ओर प्रेरणा देता है
    अर्थ - उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप , श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नांशक, देवस्वरूप, परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।