Monday, September 28, 2015

काल सर्प दोष का उपाय




    जन्म पत्री में बन रहे काल सर्प दोष को लेकर अनेक विवाद हैं। अलग-अलग स्कूलों का सार निकाला जाए तो अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि तथाकथित् यह दोष विवादास्पद है फिर भी इस दोष को लेकर लोगों के मन में एक अज्ञात भय अवश्य व्याप्त है। यदि मन कहीं भय से त्रस्त है तो एक बार यह उपाय अवश्य कर लें। सम्भवतः काल सर्प दोष के कोप और भय से मुक्ति मिल जाए।  

Saturday, September 19, 2015

जैन धर्म का एक महान पर्व - पर्युषण



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जैन धर्म के एक महान पर्युषण पर्व पर 
गोपाल राजू के whatsaap के एक ग्रुप का छोटा सा ऑडियो

शनि ग्रह कष्टकारी है क्या


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शनि ग्रह कष्टकारी है क्या ?
तो क्या वो मात्र शनिवार को ही उपाय कर लेने से शांत हो जायेगा?
मनन करें इसपर...............
कृपया सुनें,
गोपाल राजू के Whats app group  का एक तार्किक ऑडियो
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Thursday, September 17, 2015

Going For Some Important Work, Follow This

  
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Perform this before proceeding for any auspicious work
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Remedy for late marriage - Through Audio

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लड़के लडकियों के विवाह में यदि विलम्ब हो रहा है 
तो ये एक सरल सा उपाय कर के देखें
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Friday, September 4, 2015

तंत्र से लवंग के सरल उपाय



#Clove    
गोपाल राजू की चर्चित पुस्तक, 'तंत्र के सरल उपाय' का सार-संक्षेप
                
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'ललित लवंग लता परिशीलन,
कोमल मलय शरीरे......'
    महाकवि जयदेव की अमृत वाणी लवंग के विषय में इन दो पंक्तियों में सब कुछ कह गयी।
    लवंग(Clove) एक मध्यम आकार का सदाबहार वृक्ष से पाये जाने वाला बिना फिला हुआ पुष्प है। खाने के प्रेमियों के लिए स्वाद और आयुर्वेद में औषधीय गुणों के भण्डार को अपने में समेटे हुए होने के कारण इसका व्यापक रूप से प्रयोग सैकड़ों वर्षों से होता रहा है। पूजा पद्यतियों के साथ-साथ तंत्र शास्त्रों में लवंग का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। अनेक ऐसी साधनाएं हैं जो लवंग के बिना पूर्ण ही नहीं मानी जातीं। 
प्रेत बाधा, वशीकरण, जम्बूकी अर्थात् सियार सिंघी साधना, भुजयुग्म अर्थात् हाथा जोड़ी साधना आदि अनेकों में लवंग का प्रयोग आवश्यक रूप से किया जाता है।
1. लौंग तथा कपूर और इलायची जलाकर उसकी बनी राख को घर के मुख्य द्वार पर छोड़ दिया करें वास्तु दोष जनित दोष दूर होंगे।
2. दो फूलदार लौंग चांदी की छोटी सी कटोरी में कपूर के साथ नित्य चौका सिमटने के बाद जला दिया करें, अन्नपूर्णा माँ की कृपा बनी रहेगी ।
3. धन प्राप्ति की कामना के लिए लक्ष्मी जी को नित्य दो लौंग अर्पित करें।
4. लौंग को भांगड़ा के रस में घिसकर लेप बनाएँ और 'ऊँ नमो भगवते शत्रुणां बुद्धिस्तम्भ्य कुरु-कुरु स्वाहा' मंत्र जप करते रहें, शत्रु आपके वश में होने लगेंगे।

5. जन्मपत्री में यदि राहुदोष के कारण कष्ट भोग रहे हैं तो रविवार के दिन लौंग दान कर दिया करें। स्वास्थ्य लाभ के लिए घर में लौंग का पौधा लगाना बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।
6. नवरात्रों में 'ऊँ ऐं ह्री क्लीं चामुण्डायै विच्चे' मंत्र जपकर लौंग, गोघृत, शक्कर तथा गोला गिरी से अग्नि में पाँच आहुतियाँ दिया करें, माँ की कृपा परिवार पर बनी रहेगी।
7. मानसिक संत्रास, अनिद्रा आदि से यदि पीड़ित हैं तो चमेली के तेल में कुछ लौंग डालकर उसका दीपक अपने शयन कक्ष में जलाया करें। दुःस्वप्न के कारण यदि रात में मन अस्थिर रहता है तो सोने से पूर्व कपूर के साथ दो लौंग जलाकर पांच बार मंत्र 'ऊँ स्वप्नेवराय नमः' जप कर लिया करें। 

8. अमावस्या की रात्रि को कपूर के साथ दो लौंग जलाएँ। राख से उस व्यक्ति का नाम सादे कागज पर लिखें जो आपको आपका पैसा नहीं लौटा रहा अथवा अन्य किसी अन्यायपूर्ण कृत्य से आपको तंग कर रहा है। कागज को अपने दाएँ पैर से किसी वीराने स्थान में दबा दें। व्यक्ति आपकी सुनने लगेगा।
9. दो फूलदार लौंग लें उनको अपनी जीभ पर ऊपर से नीचे तक फिराएँ और उस व्यक्ति को किसी भी रूप में खाने में दे दें जिसको अपने वश में करना है, उसका प्रबल आकर्षण होने लगेगा।
10. दो लौंग 'ऊँ ऐ ह्री क्लीं चामुण्डायै विच्चे (अमुक) फट् उच्चाटन कुरु कुरु स्वाहा' मंत्र से अभिमंत्रित करके किसी भी रूप में उस व्यक्ति को खिला दें, जिसका उच्चाटन करना है। 

11. दो लौंग उस समय मुँह में रख लें जब किसी साक्षात्कार, विशेष इष्ट सिद्धि अथवा अन्य किसी आवश्यक कार्य आदि के लिए घर से निकल रहे हों। उनके अवशेष उस स्थान पर चुपके से गिरा दें जहां से कार्य होने हैं अथवा जहाँ पर आप साक्षात्कार दे रहे हैं। आपका कार्य अवश्य ही सिद्ध होगा।
12. दो लौंग 'वषट् ऐं ह्री क्लीं चामुण्डयै विच्चे (अमुक) वषट् में वशय कुरु कुरु स्वाहा' मंत्र से अभिमंत्रित करके व्यक्ति को किसी भी रूप में खिला दें, उसका प्रबल वशीकरण होने लगेगा। 

Thursday, September 3, 2015

शनि ग्रह के भय से पायें मुक्ति




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    सूर्य पुत्र शनि ग्रह की तथाकथित् ढइया और साढ़ेसाती दोष दुष्प्रभाव ज्योतिष शास्त्र में तीन स्थितियों से निर्धारित किया जाता है। व्यक्ति की जन्म कुण्डली में लग्न से तथा चन्द्र और सूर्य की विभिन्न भावगत स्थितियों से । भचक्र में शनि ग्रह का बारह राशियों में गोचर वश भ्रमण लगभग तीस वर्षों में पूर्ण होता है। व्यक्ति के जन्म विवरण उपलब्ध न होने की स्थिति में प्रायः उसके चलित नाप की राशि से यह दोष देखे जाते हैं। लग्न, चन्द्र, सूर्य अथवा नाम राशियों से शनि जब चौथी और आठवीं राशियों में प्रवेश करता है तब यह स्थिति शनि की ढइया तथा बारहवीं, पहली और दूसरी राशियों पर का भ्रमण काल शनि की साढ़े साती कहलाता है। शनि ग्रह की यह स्थितियाँ तीन प्रकार से अर्थात् तीन चरणों में अपना दुष्प्रभाव दिखलाती हैं। पहले चरण में व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ता है। वह सामान्य व्यवहार से इधर-उधर भटकने लगता है। उसके प्रत्येक कार्य में अस्थिरता आने लगती है। व्यर्थ के कष्ट और अकारण उपजी उलझने उसके दुःखों का कारण बनने लगती है। दूसरे चरण में व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रीक रोग घेरने लगते हैं। तीसरे चरण तक दुःख और कष्ट झेलते-झेलते वह जीवन से त्रस्त हो जाता है। तीनों, दैहिक, भौतिक और आध्यात्मिक कष्टों के कारण जीवन नैराश्य, मानसिक संत्रास, ग्रह क्लेष, अस्थिरता, रोग-शोक आदि के मिले-जुले कष्टों में व्यतीत होने लगता है।
    शनि ग्रह के फलित में दुष्प्रभाव देने के सामान्यतः माने गए मूल कारण शनि की ढइया और शनि की साढ़े साती, देखा जाए तो तीस वर्ष में व्यक्ति दो बार अर्थात् पांच वर्ष शनि की ढइया और एक बार अर्थात् साढ़े सात वर्ष शनि की साढ़े साती अर्थात् कुल साढ़े बारह वर्ष का कोप भाजन बनना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन के आधे से अधिक समय व्यक्ति तीन बार साढ़े साती और छः बार ढइया अर्थात् पूरे साढ़े सैतींस वर्ष तो शनि के इस तथाकथित दोष को भोगने में ही व्यतीत कर देता है। अत्यन्त सामान्य सी भाषा में इस शनिग्रह के कष्ट देने के लिए कह दिया जाता है कि शनि तो बस एक न्यायाधीश है, वह स्वयं कुछ नहीं करता। वह तो व्यक्ति के जन्म-जन्मान्तरों के दुष्कर्मों के भोग का बस उचित न्याय मात्र करता है। जो सजा व्यक्ति के लिए निर्धारित होती है, कष्टों के रूप में इन वर्षों में तद्नुसार वह व्यक्ति को काटनी ही पड़ती हैं।
    यह तो हुई मात्र एक चन्द्र लग्न से गणना की गयी शनि दोष की बात। यदि सूर्य और लग्न की अथवा नाम की राशियों से भी दोष की गणना की जाए तब तो व्यक्ति का एक जीवन क्या दो-चार जीवन भी कम पड़ जाएंगे सजा भोगने के लिए। 
    बौद्धिकता से देखा जाए तो शनि ग्रह के इस महादोष की मान्यता निरर्थक और हास्यप्रद लगेगी। ऐसा भी नहीं है कि शनि के यह दोष कल्पना मात्र ही हैं। दोष हैं अवश्य परन्तु अज्ञानता में शनि का भूत और शनि का हौवा अधिक बना दिये गये हैं। किसी व्यक्ति को कहीं भी, कभी भी कोई कष्ट हुआ, कोई आर्थिक संकट आया, किसी असाध्य रोग ने घेरा तो बस अज्ञानता में यह बलात् मन में बैठा दिया जाता है कि शनि का कोप है, शनि के लिए दान-पुण्य करो।
    ज्योतिष शास्त्र में किसी एक ग्रह को लेकर किया गया निर्णय सर्वथा अनुचित है और केवल अज्ञानता और भय उत्पन्न करने वाली ज्योतिष का ही अकारण निमित्त है। विभिन्न भावगत ग्रह स्थिति, बलाबल, दशा, अन्तर्दशा, षोडश वर्ग, अष्टक वर्ग आदि द्वारा समस्त ग्रहों का अवलोकन किए बिना शनि के इस महादोष की गणन करना सर्वथा अनुचित है। शुभ और अशुभ का जीवन में निर्णय ग्रह-नक्षत्रों तथा ग्रहगोचर के संयुक्त ज्ञान और विशुद्ध गणनाओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इसलिए पहले भय का भूत तो मन से बिल्कुल ही हटा दें।
तथापि् यदि वास्तव में कोई व्यक्ति शनि की पीड़ा का कारण बन रहा है तो उनके लिए सरल से अनेकों विकल्प हैं। 
    रत्नों का विकल्प अपने दीर्घ कालीन अध्ययन-मनन में मैंने प्रभावशाली पाया है। अपनी फाइलों से छाँटकर एक बहुत ही पुराना विवरण दे रहा हूँ ।अपनी पुस्तक के इस उदाहरण को चुनने का विशेष कारण यह है कि उपयुक्त रत्न यदि किसी दोष का गणना कर लिया जाये तो बहुत ही सन्तोष जनक परिणाम मिल सकते हैं।
    बरेली में 8 नवम्बर 1945 को दिन में 12 बजकर 55 मिनट पर जन्मे एक सज्जन की कुण्डली में मकर राशि की लग्न में सप्तम भाव में शनि एवं मंगल, नवम भाव में गुरू, दशम भाव की तुला राशि में सूर्य और शुक्र, एकादश भाव की वृश्चिक राशि में बुध और चन्द्रमा तथा छठे और बारहवें भाव में क्रमशः राहु और केतु स्थित थे। दुर्भाग्य की दृष्टि से देखा जाए तो यह पत्री अपने में सबसे निकृष्ट पत्री देखी है मैंने अपने जीवन में। इनके विषय में प्रचलित था कि चाहे खेल का मैदान हो या कोई राग-रंग का कार्यक्रम, सबमें इनका नाम चर्चित रहता था। गायन, चित्रकारी, लेखन, भ्रमण, अध्ययन, मनन आदि अनेकों विद्याओं में इनकी अच्छी जानकारी थी। 
परन्तु ग्रहों के दुष्प्रभाव के कारण जीवन के किसी भी पहलू को वह पूर्णतः नहीं छू सके। जीवन के अभावों में अध्ययन कार्यों में भी इनके अनेकों व्यवधान आते रहे। शनि का तुला राशि में प्रवेश उनके जीवन में स्थिरता तथा गंभीरता लाने लगा। जीवन को सफल बनाने का उन्होंने एक लक्ष्य बना लिया गुह्य विद्याओं में शोधपरक कार्य करने का । यहाँ से धन, नाम, तथा जीवन की सुख सुविधाएं उनको मिलने लगीं।
    पंचधा मैत्री से देखें तो शनि के मित्र हैं शुक्र, राहु और गुरू। तुला राशि में शनि बलवान होता है। साढ़े साती प्रारम्भ होने से कुछ दिन पूर्व ही मैंने उनको एक नीलम रत्न धारण करवाया था। पुखराज वह पूर्व में पहने ही हुए थे। साढ़े साती प्रारम्भ होते ही कुछ दिन उनके जीवन में कलह, क्लेष, तथा तरह-तरह से कष्ट और आर्थिक कठिनाइयाँ प्रारम्भ हो गयी। अपने रत्न चयन को लेकर मैं पूर्णतः आश्वस्त था। एक बार पुनः मैंने उनकी जन्मपत्री का अवलोकन किया। शनि के गोचर स्थान से आठवीं राशि गुरू की पड़ती है। गुरू का रत्न पुखराज यहाँ अरिष्टकारी बन रहा था, उसको तुरन्त उतारने का मैंने उनको परामर्श दिया। 
पुखराज का उतरना था कि चमत्कारी रूप से शनि के दुष्प्रभावी साढ़े साती का भी सुप्रभाव उनके जीवन में प्रारम्भ हो गया। शनि के वृश्चिक राशि को पार करते ही अर्थात् 16 दिसम्बर 1987 से उनके जीवन में दुर्भाग्य का पुनः पर्दापण हो गया। जो सज्जन हवाई यात्रा और अच्छे से अच्छे होटलों में अपना समय बिताते थे उनके पास एक पुरानी कार भी नहीं बची। उनकी मनःस्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। जन्म पत्री का अवलोकन करने पर स्पष्ट हुआ कि धनु राशि (जहां गोचरवश शनि स्थित था) से शनि अष्टम भाव में स्थित था। यह शनि की साढ़े साती का पूर्ण रूप से अपना दुष्प्रभाव दिखलाकर उनके जीवन को उथल-पुथल कर रहा था। मैंने उनको नीलम उतरवाकर पुनः पुखराज धारण करवा दिया। एक माह के अन्दर-अन्दर ही उनका जीवन पुनः स्थिर होने लगा।
    कहने का तात्पर्य यह है कि शनि की साढ़े साती का उचित निदान मिल जायें तो ग्रह का विपरीत प्रभाव भी शुभप्रद सिद्ध होने लगता है।
    साढ़े साती में रत्न धारण करवाते समय आप भी ध्यान रखें कि रत्न से सम्बन्धित उस ग्रह का किसी भी प्रकार से सम्बन्ध उसके गोचर भाव से छठे एवं आठवें भाव से ना हो।
    दूसरे, शनि का तथाकथित् यह दाष यदि वास्तव में पीड़ा का कारण बन रहा है तब क्या वह मात्र शनिवार को ही दान करने से ही दूर हो जाएगा? बौद्धिकता से मनन करें। यदि कष्ट है तब वह तो हर दिन पीड़ा कारक सिद्ध होगा। इस लिए उपाय करना है तो प्रतिदिन क्यों न किया जाए।

Tuesday, September 1, 2015

कल्प वृक्ष के कुछ सरल प्रयोग




गोपाल राजू की पुस्तक 'तंत्र के सरल उपाय का सार-संक्षेप'
मानसश्री गोपाल राजू
    
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 पौराणिक कथाओं के अनुसार जब अमृत प्राप्ति के लिए देवताओं और असुरों के मध्य समुद्र मंथन का कार्य किया गया तब उसमें से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक रत्न कल्प वृक्ष ¼Kalpvriksh½ भी था। यह देवराज इन्द्र को दे दिया गया और उन्होंने उसको सुरकानन वन में अर्थात् आज हिमालय के कहीं उत्तरी भाग में स्थापित कर दिया। पद्मपुराण में देखें तो पता चलता है कि पारिजात नामक वृक्ष वस्तुतः कल्प वृक्ष ही है। इस वृक्ष को अडनसोनिया (Adansonia)और बाओबाब (Baobab) नामों से व्यापक रूप से जाना जाता है। Bombacaceae  परिवार का यह वृक्ष गजबाला, गोरक्षी, गोपाली, सर्पंदी, गंधबहुला, गोरख अमली, कल्पदेव आदि नामों से भी जाना जाता है। दिव्य गुणों को अपने में समाहित किये होने के कारण इस वृक्ष को इच्छापूर्ति करने वाला वृक्ष (Wish Fulfilling Tree) भी कहते हैं। तंत्र शास्त्रों में कल्प वृक्ष को लेकर अनेकों मान्यताएँ हैं। पाठकों के लाभार्थ कुछ सरल प्रयोग प्रस्तुत कर रहा हूँ-
1. कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर कोई भी साधना करते हैं, तो वह बहुत जल्दी फलीभूत होगी।
2. ऐसे ही कुछ समय के लिए कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान कर लिया करें, मानसिक शान्ति के लिए यह बहुत प्रभावशाली सिद्ध होगा।
3. वृक्ष का एक पत्ता 'ह्री' बीज अंकित करके अपनी पूजा में स्थापित कर लिया करें, यह बहुत ही सौभाग्यशाली सिद्ध होगा।
4. कोई भी अगूंठी, कड़ा, छल्ला आदि धारण करने से पूर्व उसे कुछ समय के लिए वृक्ष की जड़ में दबा दिया करें, उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
5. ब्रह्ममुहूर्त में दीन-हीन बनकर अपनी इच्छापूर्ति की प्रार्थना व़ृक्ष के नीचे बैठकर कर लिया करें, आपका कार्य अवश्य ही सिद्ध हो जाएगा।
6. किसी कर्म का प्रायश्चित करना है तो वृक्ष की प्रदक्षिणा करते हुए क्षमायाचना मन ही मन करके वृक्ष में जल छोड़ दिया करें।
7. सौभाग्य से जिस घर या प्रतिष्ठान में कल्पवृक्ष होगा, वहाँ सभी कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न होंगे।
8. कल्पवृक्ष की मूल शुभ मुहूर्त में विधिनुसार निमंत्रण देकर घर ले आएँ, यथाभाव पूजा अर्चना के बाद उसे विराजमान कर लें। नित्य गूगुल की धूनी दिखाया करें।  आवश्यक कार्य हो अथवा कहीं किसी अन्य कार्य विशेष के लिए जाना हो तो यह मूल साथ लें जाया करें, आपका कार्य अवश्य सिद्ध होगा।
9. कल्पवृक्ष के फल को सुखाकर रख लें। शुभ मुहूर्त में अष्टगंध का लेप करके, इस पर चांदी का पत्रा चढ़वा लें और अपनी पूजा में स्थापित कर लें। घर, परिवार अथवा व्यापार के लिए यह बहुत शुभ सिद्ध होगा।
10. कल्पवृक्ष की लकड़ी से यंत्र लेखन के लिए कलम बनाएँ, यंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
11. सौभाग्य से कल्पवृक्ष का बांदा मिल जाए तो शुभ मुहूर्त में पूर्व निमंत्रण देकर वह घर ले आएँ और यथाभाव पूजा करके अपनी पूजा में विराजमान कर लें। नित्य कल्प बांदा का 'ऊँ सर्वसुख कराय अकाल मृत्यु हराय' मंत्र जपकर धूप-दीप दिखाकर पूजा किया करें। आपका कोई भी कार्य असाध्य नहीं रहेगा। उत्तम स्वास्थ्य के साथ आप अनेकानेक सुखों का भोग करेंगे।
12. दीपावली की रात्रि में कल्प वृक्ष का फल एक लाल कपड़े में लपेटकर अपनी पूजा में स्थापित कर लें | लक्ष्मी जी की कृपा आप पपर पूरे वर्ष बनी रहेगी |
13. कल्पवृक्ष के पुष्प से लक्ष्मी-नारायण जी के किसी मन्दिर में लक्ष्मी जी का मंत्र जाप करें | हर जप के बाद पुष्प देव को अर्पित करें | अंत में एक पुष्प प्रसाद की तरह लाकर अपने पैसे रखने के स्थान में स्थापित कर लें |
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