Wednesday, April 29, 2015

विपश्यना क्रिया और उसके लाभ - Vipassana



रूड़की - 247 667 (उत्तराखण्ड)




http://www.bestastrologer4u.blogspot.in 


    एश्वर्य, भोग-विलास, धन-सम्पदा आदि भौतिकवादी भोगों के साथ-साथ हर कोई ध्यान, शान्ति, स्वास्थ्य, अध्यात्म, योग आदि के लिए आज ऐसी दिव्य, भावशाली औषधि, विधि, क्रिया तलाश रहा है जो सब कुछ अलाउद्दीन के चिराग़ की तरह तत्काल उपलब्ध करवा दे। इसके लिए जगह-जगह दुकानें खुल रही हैं। दान, अनुदान, धन-सम्पदा आदि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में दें और  यह सब क्रय कर लें अथवा कृपा प्रसाद स्वरूप प्राप्त कर लें। देखा जाए तो  जितने अधिक स्कूल आज खुल रहें हैं उतनी ही अधिक मानसिक अराजकता बढ़ रही है। यह सब कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं है। हम सब यह अच्छी तरह से जानते हैं, समझते हैं और दैनिक जीवन में नित्य देख रहे हैं, कर रहे हैं और परिणाम, जो कुछ भी हैं अच्छे या बुरे, भोग रहे हैं। 

Friday, April 24, 2015

लक्ष्मी की सरलतम साधना में दीप परिक्रमा

 #गोपाल राजू
#Laxmi Sadhna
 
गोपाल राजू की चर्चित पुस्तक, 'दूर करें दुर्भाग्य' का सार-संक्षेप

रूड़की - 247 667 (उत्तराखण्ड)


  
Laxmi Puja



 लक्ष्मी की साधना में दीप परिक्रमा का बहुत महत्व है परन्तु इसका विधान बहुत जटिल है। क्योंकि इसमें सोने, चांदी, कांसे, ताँबे तथा लोहे के दीपक प्रयोग किए जाते हैं इसलिए यह साधना सर्वसाधारण की सामर्थ्य से दूर भी है। तथापि् इन दीपकों के प्रयोग की सरलतम विधि पाठकों के लिए सर्वप्रथम इस लेख के माध्यम से दे रहा हूँ। दीपावली-होली की रात अथवा अपने बुद्धि-विवेक से अन्य किसी शुभ मुहूर्त में यह प्रयोग करें। 

Wednesday, April 22, 2015

राहु और केतु कोई भूत-प्रेत नहीं हैं - Rahu and Ketu

#राहु
#केतु


गोपाल राजू  की पुस्तक, 'अन्धविश्वास सत्य और तथ्य' का सार-संक्षेप
Rahu and Ketu

मानसश्री गोपाल राजू
रूड़की - 247 667 (उत्तराखण्ड)
   


Rahu and Ketu

 

    ज्योतिष साहित्य में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र और शनि सात ग्रहों का वर्णन विस्तार से मिलता है। इनके अस्तित्व, अध्ययन और प्रभाव का सारे विश्व में चलन है। सप्ताह के सात दिनों रवि, सोम, मंगल आदि के नाम भी इन्हीं ग्रहों के अनुरूप रखे गए हैं । दो अन्य ग्रहों राहु और केतु को इन पिण्डों से अलग श्रेणी में रखा गया । राहु और केतु द्वारा सूर्य अथवा चन्द्रमा को ग्रसने और उस स्थिति से उत्पन्न ग्रहण के दुष्परिणामों को लेकर अनेक अन्धविश्वास प्रचलित हैं। यहाँ तक कि इनको भूत-प्रेत आदि जैसे भय का पर्याय तक बना दिया गया है। यहाँ तक भय और भ्रम बना दिया गया  है कि इन सबसे अनर्थ होना ही होना है। 

Sunday, April 19, 2015

Terrorrist Blasts Why on Specific Dates


 #Terrorist

#Blast

#Terror

#Bestastrologer

#Topastrologers

#bestastrologerinindia

#Gopal Raju

 

 
Terrorrist Blasts Why on Specific Dates 

Not only 1, 2 or 3 but myriad examples are being giving to varies social sites, press and TV etc.for the last ¾ years that numerological and astrological calculation said the maximum blasts or attacks are commencing   when number 2, 7 and 9 are falling either as prime number or as lucky number and number 1 is said to the most fortunate number since minimum such attacks have overcome.
April, 18, 2015 (1+8=9) Blast in Jalalabad, Afghanistan 
 has proved once again this fact.
If interested in detailed articles may please visit the links given below.

Terrorist blasts on 02nd April, 2015

At:

Garisa University,  Kenya and Khost in Afghanistan.
I am regularly writing that the numbers 2, 7 and 9 are causing most of the terrorist blasts,
while number 1 is noticed to be the most safe in Numerology.
This I am trying to prove with the help of stastical data of Worldwide Terrorist Blasts and Attaches since long.
For details of earlier mails and links,
May please see as mentioned below:
Terrorist Blasts May be predicted. Details at :http://bestastrologer4u.blogspot.in/2015/04/blog-post.html

More Details at:

Terrorist Attack on Peshawar School

दहशतगर्दों की एक और करतूत पेशावर में

फिर खेला  है २, , ९ में से अंक ७ ने पेशावर में खूनी खेल

Click for details at:   

https://www.facebook.com/bestastrologerinroorkee

 

१६. १२. २ ०१४ (१+६=७) को आर्मी पब्लिक स्कूल पेशावर में दहशतगर्दों की इस दरिंदगी ने पूरी दुनिया को हिला दिया है । जिसमें  थोड़ी सी भी भावना है वह इस आतंकी हमले से दुःखी हुए बिना नहीं रहेगा ।

मैं गुह्य विधाओं का एक शोधकर्ता हूँ । जो लोग  मुझे पढ़ रहे हैं उन सबने मेरा सर्वाधिक चर्चित लेख,

, ७ और ९ ने बैठाया है सर्वाधिक आतंकी धमाकों का गणित

ज़रूर देखा होगा । विश्व भर में हुए सैकड़ों आतंकी अनेकों धमाकों से मैंने ये सिद्ध किया था  कि २,७ अथवा ९ अंक, चाहें मूलांक हों या भाग्यांक, ७०% से भी अधिक ऐसे खूनी आतंकी धमाकों में अवश्य सामने आये हैं  । आज १६ तारीख अर्थात (१६=१+६=७) को पुनः पेशावर की इस घटना ने बात की पुस्टि  कर दी है ।

जो लोग व्यावसायिकता से दूर वास्तव में अंक विधा में रूचि रखते हैं उनसे निवेदन है कि मेरे इस शोध कार्य को और भी आगे बढ़ाएं । संभवतः इस प्रयास से जाँच कर्ताओं को दहशतगर्दी के इस खूनी खेल में कोई अहं सूत्र मिल जाएँ और मासूम जीवन बच जाएं 

पुनःएक खूनी अंक २, ऐसे अनेकों उदाहरण दिए हैं मैंने)

 

विश्व भर में हुए सैकड़ों आतंकी धमाकों के लिए कृपया लिंक्स देख भी सकते हैं  :

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Wednesday, April 15, 2015

पारिजात - एक चमत्कारी वृक्ष (Parijaat)




Parijat

   
    चिरन्तर से वृक्षों में निहित गुण-धर्मों के कारण उनका महत्त्व कहा जाता रहा है। पीपल, बरगद, अशोक, सिरस, ऑवला आदि अनेक वृक्षों को तो साक्षात् देव तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती रही है। विधि ने इन वृक्षों में जीवन दायनी शक्ति प्राकृतिक रूप से कूट-कूट कर भर दी है। आस्था की पराकाष्ठा तो यहाँ तक है कि आम, बेल, केले, आदि के बिना तो हमारे कोई भी धार्मिक कर्म सम्पन्न ही नहीं होते। जीव, वृक्ष, पर्यावरण और धरती एक दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे से परस्पर सामंजस्य बनाए हुए हैं। इसमें निहित प्राकृतिक तालमेल में जब भी कभी कमी आयी है, प्राकृतिक आपदाओं ने अपना विकराल रूप दिखाया है। क्या पता वृक्षों के संरक्षण के भाव के पीछे ही सम्मवतः उनको देव तुल्य स्थान दिया गया हो । जो कुछ भी है परन्तु यह सत्य है कि वृक्षों के अस्तित्व के बिना जीवन की कल्पना सहजता से नहीं की जा सकती है।
    भारतीय वांगमय को यदि तलाशें तो विभिन्न वृक्षों की महिमा अनेक स्थानों पर मिल जाएगी। हरिवंश पुराण में एक विलक्षण वृक्ष पारिजात का वर्णन आता है। इसको हरसिंगार भी कहते हैं। देवताओं और असुरों के द्वारा समुद्र मंथन के मध्य इस वृक्ष का उत्पन्न होना पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है। तदन्तर में इन्द्र ने स्वर्ग में इसको स्थापित किया था।
    पौराणिक मान्यता के अनुसार कृष्ण जी सत्यभामा के पारिजात पुष्प मोह से  इतना विवश हो गए थे कि इन्द्र देव से उसके लिए अन्ततः उनको युद्ध तक करना पड़ा। इन्द्र अन्त में पराजित हुए और इस प्रकार भूलोक पर कृष्ण द्वारा यह वृक्ष लाकर सत्यभामा की वाटिका में लगा दिया गया। परन्तु पराजय की हार से त्रस्त पारिजात वृक्ष इन्द्र द्वारा श्रापित हुआ और इसीलिए ही आज तक इसमें कभी कोई फल नहीं लगता।
    एक विवरण मिलता है कि पारिजात नामक एक राजकुमारी को सूर्य से इतना अधिक प्रेम हो गया कि उसने उनसे विवाह का प्रस्ताव तक रख दिया । परन्तु सूर्य ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। राजकुमारी को इससे इतना आघात पहुँचा कि उसने आत्म हत्या कर ली। जहाँ राजकुमारी की समाधि बनी वहाँ एक वृक्ष निकल आया। पारिजात के मार्मिक प्रेम और उनके नाम पर ही इसका नाम पारिजात वृक्ष पड़ गया।
   महाभारत काल की एक ऐसी मान्यता भी प्रचलित है कि माता कुंती की पूजा-अर्चना के लिए सत्यभामा की बगिया से पाण्डवों द्वारा यह विलक्षण वृक्ष लाकर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के समीप किंटूर ग्राम में स्थापित किया गया, जो वर्तमान में भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। सामान्यतः यह वृक्ष 20-25 फिट ऊँचे होते हैं परन्तु किंटूर का यह वृक्ष लगभग 50 फिट ऊँचा है। इस सघन वृक्ष की विलक्षणता यह हैं कि न तो इसमें कोई बीज उपजता है, और न ही इसकी कोई कलम आदि बनाकर इसकों पुनः उगाया जा सकता है । बाराबंकी में पाये जाने वाले इस पेड़ का वनस्पति शास्त्र में नाम है 'आडानसोनिया डिजिटाटा'। अंग्रेजी में 'बाओबाब' नाम से जाना जाने वाला यह वृक्ष वस्तुतः अफ्रीकी मूल का वृक्ष है। मध्य प्रदेश के मांडू और होशंगाबाद में भी 'बाओबाब' वृक्ष मिलते हैं । ऐसी मान्यता है कि इनकी आयु 1000 से लेकर 5000 वर्ष तक की होती है। महाराष्ट्र में पाये जाने वाले पारिजात हरसिंगार का वानस्पतिक नाम 'निक्टेंथस आर्बर ट्रिसट्रिस'  है । इन दोनों पेड़ों के रंग रूप में काफी असमानता है। अब उत्तराखण्ड,  राजस्थान तथा मध्यप्रदेश आदि के कुछ तीर्थ विशेष में भी कल्प वृक्ष की प्रजातियाँ लगाई गयी हैं और उनको  मूल कल्प वृक्ष की तरह ही पूज्य माना जा रहा है।
    कहने का कुल तात्पर्य यह है कि धरती पर यह पौराणिकवृक्ष अपने में एक अनोखा वृक्ष है। मान्यता तो यहाँ तक है कि इसके निकट आते ही समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं । इस कारण से इसको कल्प वृक्ष की भी संज्ञा दी गयी है वृक्ष के कारण विश्वस्तर पर इस छोटे से स्थान का नाम प्रसिद्ध हो गया है। आयुर्वेद में इस वृक्ष के फूल, पत्ते, छाल और मूल तक सबका अपना-अपना विशेष महत्त्व है। वृक्ष के घटकों से अनेक औषधियाँ तैयार की जाती हैं और रोग के निदान में उनका उपयोग किया जाता है। कहते हैं स्त्रियों के अनेकों रोगों में इन घटकों से निर्मित औषधि का चमत्कारी रुप से प्रभाव पड़ता है। हृदय रोग, सायटिका में इन औषधियों का सफल प्रयोग देखा जाता है।
    अध्यात्म जगत में देखें तो वृक्ष के सुगन्धित पुष्पों से पूजा का विशेष फल मिलता है। मान्यता है कि पारिजात के पुष्प तोड़कर नहीं बल्कि धरती से बीनकर प्रयोग किए जाते हैं। जगत का यह अकेला वृक्ष है जिसके पुष्प पूजा के लिए तोड़े नहीं जाते। विधि की लीला है कि वृक्ष के पुष्प केवल रात्रिकाल में ही खिलते हैं, स्वतः ही धरती पर टूट कर बिखर जाते हैं और प्रातः सूर्य की पहली किरण पड़ने के साथ ही मुरझा जाते हैं ।
   तंत्र में पुष्पों का विशेष स्थान है। रात्रि पूर्णिमा काल में कुछ पुष्प धरती से बीनकर एक लाल पोटली में बन्द करके अपनी पूजा के स्थान,  अलमारी, सेफ आदि में सुरक्षित रख लें। इनका करना कुछ नहीं है, यह अपने में स्वयंसिद्ध एक विग्रह बन जाता है। इसमें लक्ष्मी जी को आकृषित करने का विशेष गुण-धर्म निहित है। जब कभी लगे कि यह पुष्प सूखकर पुराने हो गये है तो उनके स्थान पर नये पुष्प पोटली में बन्द करके पुनः रख लिया करें ।
   भारत सरकार ने कल्पवृक्ष के गुणों के कारण और इसकी पौराणिकता बनाएं रखने के लिए ही एक डाक टिकट भी इस पर जारी किया है। सरकार ने टिकट जारी करके कल्प वृक्ष को अमर और प्रसिद्ध तो कर दिया परन्तु विडम्बना यही है कि ऐतिहासिक इस धरोहर के संरक्षण का कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा । परिणाम स्वरूप यह वृक्ष नष्ट होने के कगार पर है। यदि इस प्रजाति के वृक्षों को उचित संरक्षण नहीं मिला तो वह दिन दूर नहीं कि जब इस प्रकृति की सुन्दरतम निधि का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा । सम्भवतः धर्म की आस्था के नाम पर कुछ धार्मिक स्थलों में रोपे गये वृक्षों का धर्म के प्रति आस्थावान व्यक्तियों द्वारा संरक्षण सम्भव हो सके । 

 

रूड़की - 247 667 (उत्तराखण्ड)
 



पारिजात - एक चमत्कारी वृक्ष




 #bestastrologerinindia

 #पारिजातपारिजात

 

   
Parijat - Unique Tree

   


   पारिजातचिरन्तर से वृक्षों में निहित गुण-धर्मों के कारण उनका महत्त्व कहा जाता रहा है। पीपल, बरगद, अशोक, सिरस, ऑवला आदि अनेक वृक्षों को तो साक्षात् देव तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती रही है। विधि ने इन वृक्षों में जीवन दायनी शक्ति प्राकृतिक रूप से कूट-कूट कर भर दी है। आस्था की पराकाष्ठा तो यहाँ तक है कि आम, बेल, केले, आदि के बिना तो हमारे कोई भी धार्मिक कर्म सम्पन्न ही नहीं होते। जीव, वृक्ष, पर्यावरण और धरती एक दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे से परस्पर सामंजस्य बनाए हुए हैं। इसमें निहित प्राकृतिक तालमेल में जब भी कभी कमी आयी है, प्राकृतिक आपदाओं ने अपना विकराल रूप दिखाया है। क्या पता वृक्षों के संरक्षण के भाव के पीछे ही सम्मवतः उनको देव तुल्य स्थान दिया गया हो । जो कुछ भी है परन्तु यह सत्य है कि वृक्षों के अस्तित्व के बिना जीवन की कल्पना सहजता से नहीं की जा सकती है।
    भारतीय वांगमय को यदि तलाशें तो विभिन्न वृक्षों की महिमा अनेक स्थानों पर मिल जाएगी। हरिवंश पुराण में एक विलक्षण वृक्ष पारिजात का वर्णन आता है। इसको हरसिंगार भी कहते हैं। देवताओं और असुरों के द्वारा समुद्र मंथन के मध्य इस वृक्ष का उत्पन्न होना पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है। तदन्तर में इन्द्र ने स्वर्ग में इसको स्थापित किया था। 
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